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लॉक डाउन में बनाया पुस्तकालय

लॉक डाउन में बनाया पुस्तकालय



लॉक डाउन में 20 वर्षो पुरानी अखबारों से बना डाली लाइब्रेरी।आसपास के ईलाको में चर्चा का विषय बनी।कभी नक्सल के लिए प्रशिद्ध आज विद्या की अलख जगाने में लगी हुई है।लॉक डाउन में घरों में रहना और समय व्यतीत करना लोगो के लिए बड़ी परेसानी हो रही है।वही मुज़फ्फरपुर के एक व्यक्ति ने इसका सदुपयोग करते हुए एक लाइब्रेरी बनाना सुरु कर दिया।बिहार में कभी नकश्लियो के लिए प्रख्यात मुसहरी प्रखंड के सुदूर ईलाके के  गांव में मुक्तेश्वर सिंह ने पिछले बीस वर्षों से अखबार को करीब बीस वर्षां से अधिक दिनों के अखबार को श्री सिंह ने सहेज कर रखा है। 

जिसे इस लॉक डाउन का सदुपयोग करते हुए गांव के ही एक साथी की सहायोग से पुस्तकालय बनाने सुरु कर दिए।यह ऐसी लाइब्रेरी है जहां वर्षो पुरानी छपी आलेख, कहानी, घटनाएं और महापुरुषों पर छपी लेख को सहेज कर रखा गया है।इसे फाइल में पीरो कर रखा जा रहा है। 

श्री सिंह बताते है कि लॉकडाउन ने उनके कामों और आसान कर दिया है। उन्होंने बताया कि काम की  व्यस्तता से अखबरों की फाइलिंग नही हुई थी । कई वर्ष  के अखबार इक्ट्ठा हो गया था।लॉकडाउन की वजह से उसे सहेजने का सुनहरा अवसर दे दिया।इनदिनों लाइब्रेरी को अपडेट करने में जुट गया हूं।इसमें ग्रामीण व मित्रों का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। 

श्री सिंह ने बताया कि आज का दौरान डिजिटल हो गया है। ‘गुगल बाबा’ पर लोग आश्रित हो गए है। लेकिन, कभी कभार गुगल बाबा भी धोखा दे देते है। वे भी पुरानी कहानी या आलेख को नहीं दे पाते है।करेंट के समाग्री लिए गुगल बहुत शानदार व बेहतर है।लेकिन, स्थानीय और जमीनी बातों को पाठक और श्रोताओं तक नहीं ला पता है।महापुरुषों से जुड़ी सामाग्री की कमी रहती है। इस वजह से वे मैनुअल तौर पर अखबार को सहेजकर अपने लाइब्रेरी में रखते है। जब कभी कोई घटना होती है उस समय उनसे जुड़ी तमाम स्मृति छपती है फिर कभी वो एकत्रित नहीं हो पाती ।सो खासकर वैसे संस्मरणों को हम जरूर एकत्रित करते है!औरअब गाँव के बच्चो को इसका लाभ मिले इसलिये सभी के सहयोग से शिव शांति राघो पुस्तकालय बनाया है।हमे उम्मीद है कि कम्पटीशन की तैयारी करने वाले ग्रामीण विद्यार्थियों को इसका लाभ जरूर मिलेगा।
बाइट मुक्तेश्वर सिंह।वही ग्रामीण युवक बताते है कि हमलोगों लॉक डाउन में कही आ जा नही सकते इस समय हमलोग यही आकर पढ़ते है।