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जाति से दामाद चुनिए सरकार नहीं....।।

जाति से दामाद चुनिए सरकार नहीं....।।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत अपनी संक्रमण काल से गुजर रहा हैं राजनेताओं में नैतिकता का स्तर गिर रहा हैं, कहने के लिए तो भारतीय संविधान सभी के लिए एक हैं परंतु इसमे कई तरह की बाते हैं जो विवाद का विषय हैं यही कारण हैं कि राजनीति में असमानता जो दिख  रहा हैं वह इस दिशा की ओर सोचने को विवश कर रहा हैं।
बहुत मशक्कत के बाद मिली आजादी के अभी कुछ ही वर्ष बीते थे कि राजनीति में वंशवाद का खेल आरम्भ हो गया और इसकी पहली पारी कांग्रेस पार्टी ने खेली और हद तो तब हो गया जब कांग्रेस द्वारा की गई राजनीति से शिक्षा दीक्षा लेकर आज भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाने वाली क्षेत्रीय पार्टीया इसमे खासकर उत्तरप्रदेश एवं बिहार काफी मजबूती से शामिल  हो गई।आखिरकर राजनीति में वंशवाद का फायदा भी मिला।
गौरतलब हो कि बिहार लोकतंत्र की जननी होने के साथ साथ  देश की राजनीति तय करने भी अपनी महत्ती भूमिका निभाता हैं,इसलिए बिहार की राजनीति पर पूरे देश की नजर टिकी हुई होती हैं लेकिन यहाँ कि राजनीति में क्षेत्रीय पार्टी का वर्चस्व कायम हैं और उसमें शामिल राजद हो,कांगेस हो या लोजपा सभी  वंशवाद एवं जातिवाद को बढ़ावा देती हैं वही जदयू राजनीति में जाति एवं वंश से ऊपर उठकर विशेष वर्ग पर फोकस करती नजर आती हैं जबकि भाजपा भी परिवारवाद एवं वंशवाद से ऊपर उठकर राजनीति करती नजर दिखती हैं,लेकिन उसमें शामिल कुछेक नेता अपने परिवार को सदन में भेजने के लिए जुगाड़ लगाते दिख जाते हैं इसबात से भी इनकार नहीं किया जा सकता हैं। गौरतलब हो कि राजनीति में वंशवाद की बढ़ावा मिलते ही अपने वर्चस्व को कायम करने के लिए राजनीति अपराधियों का संरक्षण से अपनी वजूद बड़ा करने लगती हैं वही अपराधियों के भय से जनता के बीच उन्हें प्रतिनिधित्व करने का मौका मिल जाता हैं।इस वंशवाद को हवा देने का काम आम जनता ने किया हैं।
दीगर बात यह हैं कि राजनीति में परिवार एवं अपराधियों के एंट्री के बाद राजनीति में जाति की महत्ता बढ़ जाती हैं, जिस क्षेत्र में जिन जातियों की संख्या अधिक हैं उस जाति से ही  उस क्षेत्र में कैंडिडेट हर दल तय करती हैं,एवं यहाँ से शुरू होता है,धनबल, बाहुबल का असली खेला। जिन पार्टी के कैंडिडेट अपनी जाति के जनबल,धनबल एवं बाहुबल से फिट बैठते हैं उन्हें प्रतिनिधित्व करने का मौका मिल जाता हैं।कुछ चंद विधान सभा को छोड़ दिया जाए तो कोई ऐसी जाति नहीं हैं जो अकेले दम पर चुनाव में विजय श्री प्राप्त करा दे। इस पूरे प्रकरण में राजनेताओं से महती भूमिका होती हैं वोटरों की, वोटर कहीं न कही जाति के रूप में,धर्म के रूप में एवं अन्य लालच की वजह से ऐसे व्यक्ति को चुनता हैं जो वंशवाद एवं परिवारवाद को बढ़ावा देता हैं, आज भले ही वह वंशवाद ,जातिवाद के खिलाफ करें ।
लोकसभा का चुनाव हो या विधान सभा का या पंचायत स्तरीय चुनाव हो ,निर्णय जनता के हाथ में होती हैं जनता को सोचना चाहिए कि देश के विकास के लिए किसका साथ दे?अपने जाति का या किसी पार्टी का या विकसित सोच रखने वाले इंसान का? ग्रामीण क्षेत्रो में जाति की महत्ता इतनी बरकरार रहती हैं कि आपसी सौहार्द बिगड़ने की सम्भवनाएँ हमेशा बनी रहती हैं जबकि अनेक जगह हिंसा,मारपीट  भी हो  जाती हैं।
सोचने वाली बात हैं कि बिहार के क्षेत्रीय दल में शामिल राजद हो या कांग्रेस ,जदयू एवं लोजपा मुस्लिम वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं , फिर भी मुस्लिम उनके साथ खड़ा हैं या नहीं यह गम्भीर विषय हैं क्योंकि बिहार में ओबैसी की पार्टी का जितना यह तय कर दिया हैं कि जिस तरह बिहार की अन्य जातियाँ अपने जाति के नाम पर वोट देती हैं,उसी प्रकार वह भी अपने जाति के पार्टी का मौका मिलते ही समर्थन करने में ही अपनी भला समझते हैं।
अगर राजनीति का ये अवगुण जनता समझने में कामयाब हो जाती हैं तो राष्ट्र के विकास में निश्चित ही महत्वपूर्ण योगदान होगा। राजनेता भी जनता को अपनी जाति ,धर्म एवं क्षेत्र के नाम पर लुभाने के लिए भरसक प्रयास करते हैं और यहाँ तक भी कह दिया जाता हैं कि बेटी और वोट अपने जात में ही दिया जाता हैं। जाति जैसी कोढ़ बीमारी भारत को भयंकर गर्त की ओर ले जा रही हैं,लोगो को समझना होगा इस देश को आजाद कराने के लिए सभी जाति,धर्म एवं मजहब के लोगो ने बिना परवाह किए एक साथ आगे बढ़े थे,तो इस देश को भी आगे बढ़ाने के लिए हमसब को इनसे ऊपर उठना होगा। जाति से रिश्तेदारी बनाई जाती हैं सरकार नहीं। अगर जाति से सरकार बन रही हैं तो आजाद कराने वाले उन शहीद की आत्मा भी रोती होगी जो हँसते हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए कि मेरे आने वाली पीढियां हमें जाति के बंधनों में बांध देगी।