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शराब दवा या दंड....!।।

शराब दवा या दंड....!।।

शराब दवा या दंड....!

श्रीधर पाण्डे

 "मुझे पीने का शौक नहीं,
पिता हूँ गम भुलाने को"  शायद चारा घोटाले का गम भुलाने के लिए बिहार के थाने के मालखाने से चूहों ने लाखों लाख लीटर शराब के आनन्द लिए होंगे। विश्व के मिलियनेयर स्टार अमिताभ बच्चन की फ़िल्म शराबी की यह गाना काफी पॉपुलर थी साथ ही इसमे यह भी फरमाया गया हैं कि "नशा अगर शराब में होती तो नाचती बोतलें"।
बिहार के संदर्भ की बात करें तो 2005 में नीतिश कुमार की सरकार जब बनी तो बिहार के पास न कल करखाने थे न ही उद्योग जगत के कोई बड़ा क्षेत्र।झारखण्ड बटवारे के बाद बिहार में कुछ बचा ही नहीं था वैसे में बिहार में राजस्व बढ़ाने के लिए नीतीश कुमार ने आबकारी विभाग में  नया परिवर्तन कर वेबरेज कारपोरेशन का गठन किया।इस कॉर्पोरेशन के माध्यम से बिहार में शराब को बड़े पैमाने प्रमोट किया गया।चुकी बिहार में बढ़ते  बेरोजगारी एवं रंगदारी को रोकने के लिए नीतीश कुमार ने गली गली शराब पहुंचाया। यह एक रोजगार का विकल्प तो बना साथ ही 2012 के मध्य तक इस  तरह रोजगार के रूप में सृजन किया कि बिहार सबसे अधिक राजस्व प्राप्त करने वाला विभाग बनकर उभरा जबकि लगातार हो रही सड़क दुर्घटनाओं एव परिवारिक विवाद ने नीतीश कुमार के अंदर की मानवता को झकझोर कर रख दिया।35% महिलाओं को आरक्षण देने वाले नीतीश कुमार के अंदर निश्चित तौर  पर एक सामाजिक चेतना जागी और महिलाओं के गुहार पर उन्होंने शराब को बंद करने का निर्णय लिया। समाज में शराब के कारण आपसी सौहार्द एव कुरीतियां जो बढ़ रही थी और  बेसमय खराब शराब पीने की वजह से गरीब लाचार मारे जा रहे हैं इन सब चीजों से विचलित नीतीश कुमार राजस्व की परवाह किये बेगैर जहाँ एक तरफ अपने सामाजिक दायितव का निर्वहन करते हुए नावेल पुरस्कार विजेता के रूप में खुद को स्थापित किया और उस शराबबन्दी वादा में सफलता भी मिली। 2015 के विधान सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लाख कोशिश के बावजूद नीतीश की शराब बंदी की नीति वादे ने नीतीश कुमार को सत्ता में पुनः बैठा दिया।
गौरतलब हो कि शराब का सेवन केवल सामाजिक बुराई ही नहीं अपितु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हैं। शराब अक्सर हमारे समाज में शौक के लिए पी जाती हैं,कभी दोस्तों के दबाव में तो कभी समाजिक पार्टियों में लोग इसका आनन्द लेते हैं,क्रोध को शांत करना हो या मानसिक तनाव दूर कर  शराब आपके आत्मविश्वास को बरकरार रखती हैं मगर किसी भी समाज या धर्म इसके दुरुपयोग करने की छूट नहीं देता।
जब लोग शराब का सेवन जारी रखते है तो यह धीरे धीरे उन्हें इसकी लत लगाने की आदत बना लेती हैं और शराब के बिना उन्हें कई तरह की सामाजिक एवं मानसिक ,शारीरिक परेशानियों से जूझना पड़ता हैं उसके बावजूद भी यह लत छूटने  की बात तो दूर इसकी तलब बढ़ती ही जाती हैं। शराब की लत छुड़ाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में नशा मुक्ति केंद्र चलाए जा रहे हैं ताकि इससे मुक्ति मिल सके।
शराब की हकीकत को समझना हैं तो किसी शराबी के पास बैठ जाना,शराब क्या हैं समझना? शराब बहुत बुरी चीज है वह भी बताएगा लेकिन उनसे होने वाले फायदे का भी एहसास कराएगा। अगर शराब दवा के रूप में लेते हैं तो निश्चित तौर पर स्वास्थ्य के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं और अगर शराब की लत लग गई हो तो समाजिक बुराई के साथ साथ शरीर के विभिन्न अंगों को गवा बैठते हैं।
शराब की वजह से कई चीजें खुलकर सामने आई हैं शराब को अगर दवा की तरह हम प्रयोग में लाते हैं तो उसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट या फिर पौधे का पॉलीफेनॉल फायदेमंद होते हैं।जो लोग हप्ते में तीन या चार बार एक से दो पैग शराब का सेवन करते हैं उन्हें हार्ट अटैक की संभवनाएं कम होती है। इसके साथ ही दिमाग मे सक्रियता, किडनी में स्टोन बनने से रोकना,ब्लड शुगर का लेवल नियंत्रित करना,यौन क्रिया में बढ़ोतरी, याद रखने की क्षमता में बढ़ोतरी ,तनाव कम एवं हड्डियां मजबूत करता हैं। लेकिन यह शरीर के लिए उतना ही हानिकारक हैं यह बताने के लिए शायद ही जरूरत होगी क्योंकि इसके दुष्प्रभाव आपको अपने घर के आसपास देखने को मिल गए होंगे।
नीतीश कुमार राजस्व के कारण आज भले ही लाचार एव वेबस दिख रहे हो,कोरोना वायरस के समय सरकार कहीं न कहीं अपने आप को आर्थिक रूप से कमजोर समझती हैं। अचानक से 4000 करोड़ से ऊपर का राजस्व प्रप्त करने वाला शराब बंद हो गया हैं जबकि उसके  समानांतर कोई ऐसा उद्योग नहीं लगाया गया जो राजस्व की भरपाई कर सके।नीतीश कुमार के लिए यह चुनौतीपूर्ण जरूर हैं लेकिन निश्चित तौर पर वह बधाई के पात्र हैं।
दीगर बात यह है की एक बड़े उद्योग में शामिल शराब किसी भी राष्ट्र के राजस्व को बढ़ाने में अपनी महत्ती भूमिका निभाता आ रहा हैं।शराब सेहत के लिए हानिकारक हैं यह सब जानते हुए भी इसका सेवन एवं व्यपारिक गतिविधियों में कोई कमी नहीं आई हैं।लॉक डाउन के समय शराब के दुकान खुलने के बाद विभिन टेलीविजन एवं अन्य माध्यमो से आपके पास यह जरूर खबर पहुंची होगी कि एक दिन में कितने की शराब बिकी एवं उसे लेने के लिए गर्मी की लहलहाती धूप में किस तरह लोग सड़को पर खड़े मिले वहीं दूसरी तरफ़ एमपी में शराब कारोबारियों ने भीड़ को देखते हुए अपनी दुकान बंद रखने की सोची लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया कि जो दुकाने बन्द रहेंगी उनका लाइसेस रद्द किया जा सकता हैं इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि राष्ट्र के विकास में शराब की भूमिका क्या हैं?
 महिलाओं से बात कर शराब बंद करके राजस्व का नुकसान तो किये ही किए पर्दे के पीछे जो सबसे बड़ा रहस्य छुपा हुआ हैं उस पर प्रकाश डालते हैं
नीतीश कुमार 2005 से वर्तमान राजनीति तक मे चाणक्य की भमिका में नजर आते हैं शायद उनको इस बात का ज्ञान था कि शराब व्यवसाय के क्षेत्र में अन्य जातियों के साथ यादव की संख्या काफी हैं ।यादवों पर नकेल कसने के लिए ही शराब बंदी जैसा कठोर कानून बनाया गया ताकि लालू यादव पर जातीय दबाव बना रहे और जब भी जरूरत पड़े अपने को एक मजबूत राजनीति का दम्भ भर सके।
शराब को ज्यादा ही दंडात्मक बनाया ।शायद  बिहार में बढ़ते अपराध एव नक्सलवाद पर इतना कठोर कानून बनाने में कामयाब हो या न हो लेकिन शराब के लिए काफी सजग दिखे इनके लिए उन्होंने मानव श्रृंखला बनाया। ऐसा ऐसा प्रावधान बनाया जिससे शराब पीने वाले अपने आप को बहुत बड़े कुख्यात अपराधी के रूप में पहचाने जाने लगें ।
हालांकि अब इसका प्रतिबंध मुख्यमंत्री  द्वारा किया गया काफी ही सराहनीय पहल हैं लेकिन यह सोचने वाली बात हैं कि शराब का पूर्ण प्रतिबंध क्यों जरूरी था? क्या यह सही समय पर शराब के लिए प्रतिबंध किया गया हैं? क्या बगल के पड़ोसी राज्यों में शराब की बिक्री यहाँ शराब माफियाओं के लिए सोने पर सुहागा नहीं हैं? इन सब बातों को दरकिनार कर अपने प्रदेश में शराब पर प्रतिबंध लगाकर सूबे के मुखिया नीतीश कुमार निश्चित तौर पर बधाई के पात्र हैं,लेकिन भ्रष्ट शासन एवं लचर प्रशासनिक व्यवस्था ने शराब माफियाओं के फलने फूलने में काफी मदद कर रही हैं इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता हैं। विश्वस्त सूत्रों की माने तो कम्पनी से शराब लेकर निकली गाड़ियों को बिहार में पकड़े जाना, आखिर पुलिस के पास कौन सी तंत्र हैं कि वह सब गाड़ियों को छोड़ शराब की एक्ज़ेक्ट गाड़ी को पकड़ लेती हैं,उनका मानना हैं कि बिहार में करोड़ो लीटर की शराब की बरामदगी किसी भी कम्पनी को डुबोने के लिए काफी हैं और यह भी स्पष्ट है कि अधिकतर शराब हरियाणा से बिहार पहुंचता हैं जिसकी वजह से हरियाणा निर्मीत शराब बिहार में काफी संख्या में पकड़े जाते हैं क्योंकि इसी आड़ में शराब माफिया या फल फूल रहे हैं। निश्चित तौर पर शराब के लिए कठोर कानून बनाकर उनके पीने एवं क्रय विक्रय करने पर पूर्ण प्रतिबंध के साथ साथ जेल एवं जुर्माने का भी प्रावधान हैं इसके तहत लाखो लाख की संख्या में लोग जेल भी गए हैं उसके बावजूद भी विभिन्न तरह के मीडिया के माध्यम से हर जगह शराब की उपलब्धता की बात बताने से नहीं हिचकते साथ ही साथ जदयू के भी कई नेताओं का शराब के साथ वायरल वीडियो यह संदेश देने के काम करते आ रहे हैं कि जब लोग अपने ही पार्टी के मुखिया में आस्था एवं विश्वास नहीं रखते तो अन्य की बात क्या करना?होम डिलवरी की बात सामने उभर कर आती हैं,तो पूर्ण बन्दी के बाद इसकी उपलब्धता महंगी होने के बावजूद भी लोग इसका आनन्द ले रहे हैं।बिहार के लोकप्रिय एवं अपनी वाणी से लोगो को अपनी आकर्षित करने वाले बिहार के #डीजीपी गुप्तेश्वर पाण्डेय ने शराबबन्दी को गांव गांव तक पहुंचाने के लिए एक एक दिन में दर्जनों सभाओं कर लोगो को शराब से दूर रहने की अपील करते रहते हैं।।सता के गलियारे से मिल रही जानकारियाँ यह बताती हैं कि शराब प्रतिबंध कभी भी संशोधित हो सकते हैं क्योकि इतना दुर्लभ न हो जाये शराब। वहीं  डीजीपी शरबबन्दी कि लिए काफी सक्रिय हैं एवं शराबी लोग न बने इस दिशा में भी काफी प्रयासरत रहते हैं एवं इसी विषय को सुनने के लिए युवाओं की एक बड़ी हुजूम डीजीपी के सभाओं में पहुंचती हैं और #डीजीपी ने स्पष्ट रूप से खुले मंच से कह दिया हैं कि शराब का सेवन किसी भी रूप में बर्दशस्त करने योग्य नहीं हैं,चाहे आम हो या खास उसे किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।
एक तरफ देश की सुरक्षा के लिए खड़े जवान को शराब दिया जाता हैं ताकि वह देश की सुरक्षा में अपना महत्वपूर्ण योगदान निभा सके तो दूसरी तरफ़ यह शराब मौत का कारण कैसे बन सकता हैं?बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो शराब की सेवन कर लेते हैं और उनकी भनक दूसरे कमरे में बैठे व्यक्ति तक नहीं लगती इसबात को भी नकारा नहीं जा सकता। शराब पर पूर्ण प्रतिबंध समाज के लिए जरूरी था लेकिन समय परिस्थिति के अनुसार ताकि जब तक सम्पूर्ण राष्ट्र में इसका प्रतिबंध न हो इसकी ब्लैक मार्केटिंग होती रहेगी।नीतीश कुमार को शराब बंदी के बाद अपनी गलती का अंदर ही अंदर एहसास होने लगा कि जब वे राजस्व के घाटे का समीक्षा किया  होगा।अपनी गलती को वह सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने नीरा( ताड़ी) बनाकर नशा का दौर को जारी रखा। यह लोगो के बीच चर्चा का विषय बना हुआ हैं।गौरतलब हो कि शराब बन्दी के बाद से  इसके नियमो की धज्जियाँ उड़ाने वाले लाखों लोग जेल में बंद हैं,बिहार में शराब की बिक्री एवं पीना अपराध की श्रेणी में हैं लेकिन सरकार बदलते ही किसी कारण वश अगर शराब चालू हो जाती हैं तो उन लाखों लोगों का क्या दोष जो इसकी सजा जेल में काट रहे हैं या काट चुके होंगे?इसलिए भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए शराब हमेशा के लिए पूर्ण प्रतिबंध हो इसपर सभी पार्टियों का एकमत होना जरूरी हैं ताकि एक बार जो  अपराध हैं वह हमेशा के लिए अपराध ही रहे साथ ही साथ यहाँ की सरकार को भी इसपर गम्भीर चिंतन करना चाहिए कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी राज्य के लिए पूर्ण शराबबंदी हैं न कि सिर्फ जदयू एवं नीतीश कुमार के लिए इसलिए सरकार में शामिल भाजपा को भी लगता है कि अगर शराब बुरी चीज हैं,इसपर प्रतिबन्ध जरूरी हैं तो भाजपा शासित राज्यों में इसे पूर्ण प्रतिबंध के लिए क्यों नहीं प्रयास किया गया सोचनीय हैं?
निश्चित तौर पर शराब पर प्रतिबंध कर नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में एक नया रणनीति तैयार कर दिया हैं ताकि आने वाली हर पार्टियां समाजिक कुरीतियों के साथ छेड़छाड़ न कर सके।विभिन राजनीतिक पार्टियां इसके नाम पर राजनीति भी कर सकती हैं कि हम शराब का प्रतिबंध हटाएंगे यह शराब प्रतिबंध हटाना उतना ही खतरनाक हैं जितना एससी एसटी और आरक्षण।