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बिहार,बाढ़ और जीवन ।।

बिहार,बाढ़ और जीवन ।।

बिहार,बाढ़ और जीवन

श्रीधर पाण्डे
आज की आधुनिकता ने जीवन को जितना ज्यादा आरामदायक बनाने की कोशिश में जुटी हैं,उससे कहीं ज्यादा खुद को समेटती हुई भी नजर आती हैं।विकास की अंधाधुंध तेज रफ्तार प्रकृति के स्वमार्ग में तेजी से अवरुद्ध भी बनते जा रहे हैं जिससे धरती ज्यादा गर्म होती जा रही हैं।असमय वर्षा, तेज गर्मी,सर्दी का प्रभाव देखने को मिलना भौगिलिक दृष्टिकोण से मानव जीवन के लिए काफी नुकसान हैं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
अगर बिहार के संदर्भ में बात की जाए तो बिहार के कुछ हिस्से सुखों की मार झेलते हैं तो वही दूसरी तरफ बाढ़ का हाहाकार लाखो की जिंदगी दाव पर एवं करोड़ो की संपत्ति अपने अंदर समाहित कर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। उत्तरी बिहार की लाखों लाख की आबादी हर साल अपनी जीवन के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं।वर्षा के समय मे नेपाल में हुए पानी नदियों के द्वारा मजबूरी वश बिहार में एकाएक प्रवेश कर गाँव के गाँव शहरों को अपने अंदर समेट लेती हैं।
यह बाढ़ ऐसा नहीं कि सिर्फ बिहार में ही आता हैं,मगर बिहार की बाढ़ हर साल एक बड़ी समस्या के रूप में उभरती हैं। बाढ़ की वजह से यहाँ के लाखो लोग को अपने जीवनयापन के लिए दूसरे जगह पलायन करने को विवश हैं।
शासन एवं प्रशासन बाढ़ के समय जितनी चिंतित दिखती हैं,अगर समय से पहले यह चिंतन कर लेती तो निश्चित तौर पर ही बाढ़ के प्रभाव को कम किया जा सकता हैं। बाढ़ के समय उतरी बिहार के बरसाती नदियां  प्रलयंकारी रूप धारण कर लेती हैं,इन बरसाती नदियों वर्षा के दिनों में अपने साथ बहुत ज्यादा पानी के साथ गाद लिए आती हैं जिसकी वजह से हर साल वर्षा के दिनों में यह गाद उनके मार्ग में अवरुद्ध बनते हैं जिसकी वजह से वह मार्ग भटक दूसरे एरिया में प्रवेश कर जाती हैं इसलिए इन नदियों की समुचित सफाई हर साल कागजो पर न होकर धरातल पर कर देने मात्र से इसकी संकट को कम किया जा सकता हैं। साथ ही साथ नदियों से निकले नहर की सफाई एवं करहे का अतिक्रमण मुक्त कर उनका जीर्णोद्धार बाढ़ की संकट को कम करने में सहायक हो सकते हैं।
बाढ़ की वजह से प्रभावित हर साल लाखों लोग अपने दो जून की रोटी के लिए दर दर भटकने के लिए मजबूर हो जाते हैं।अपने गौर किया होगा कि इन समय मे बहुत से ऐसे परिवार दूसरे क्षेत्रों में भीख मांग कर अपना जीवन यापन करने लगते हैं तो वहीं कुछ लोग हर साल की त्रासदी देख दूसरे प्रदेशों में अपने लिए रोजगार की तालाश में निकल जाते हैं क्योकि वह अपनी आंखों के सामने अब दूसरे अपने परिवार के सदस्य एवं अपनी सम्पति को नुकसान देखने की हिम्मत नहीं रख पाते।। बिहार के लिए बाढ़ एक अभिशाप बन गया हैं,सरकार के द्वारा मिली मुआवजे उनकी दोनों वक्त की पेट नहीं भर सकती मगर यह बाढ़ अपने नाम पर सरकार द्वारा करोड़ो करोड़ की राशि आवंटित कर लेती हैं। एक तो यह आवंटित राशि सबको मिलती नहीं दूसरी तरफ  इस घोषित योजना का लाभ लेने के लिए विभिन्न सरकारी दफ्तरों की चक्कर, विभिन्न प्रकार के कागज एवं दलालों पर चढ़ावा इस राशि को समुचित रूप से धरातल पर उतरने नहीं देते । नहीं तो निश्चित तौर पर बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोगो की पलायन पर कुछ अंकुश लगती।
होली,दशहरा के बाद  अपने प्रदेश छोड़ जा रहे प्रवासी मजदूरों की संख्या की एक झलक रेलवे स्टेशन पर देखने को मिल जाती हैं कि किस तरह जनरल बोगी के बाथरूम तक मे भी अपने परिवार के साथ बैठ हजारों किमी की यात्रा यहाँ के मजदूर अपने बेहतर भविष्य के लिए कर रहे होते हैं। ट्रेन में चढ़ने के लिए मारपीट,आपाधापी,अनेको तरह की कष्टों को झेलते हुए रोजगार के लिए अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचना मजदूरों की प्राथमिकता हो जाती हैं।बाढ़ की जिक्र एवं मजदूरों की दशा पर बात कर दोनों को एक साथ इसलिए जोड़ना महत्वपूर्ण हो जाता हैं क्योकि बाढ़ की समस्या हर साल लोगो की जान माल को क्षति पहुंचाती हैं तो दूसरी ओर रोजगार के कोई माध्यम न होना बिहार छोड़ने वाले हर मजदूर के लिए कथा हैं।
बिहार के पूवी जिलों के मजदूरों के पलायन के लिए जन सेवा,जन साधारण नामकरण ही दर्शाता हैं कि यहाँ काफी मात्रा में मजदूर बाहर जाते होंगे जबकि यही हकीकत भी हैं। इसलिए पर्व एवं त्योहार में बहुत सारी बिहार के लिए स्पेशल ट्रेन भी चलाई जाती हैं ताकि पर्व एवं त्योहार में मजदूर किसी तरह अपने घर पहुंच सके।
सूबे के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने प्रवासी मजदूरों के रिकार्ड रखने की बात कही थी और उनके लिए जरूरी इंतजाम की भी वादा किया था हालांकि अंतरराज्य प्रवास मजदूर अधिनियम के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं को दिलाने में भी सक्षम नहीं रही या कोई दिलचस्पी नहीं लिया कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।