Headlines
Loading...
अनलॉक-1 में अपने बुरे विचारों को लॉक करें।।

अनलॉक-1 में अपने बुरे विचारों को लॉक करें।।

पटना
वरिष्ठ शिक्षाविद आचार्यश्री सुदर्शनजी महाराज ने सरकार द्वारा अनलॉक-1 की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा है कि पूरा देश लॉकडाउन की भीषण विभीषिका से त्रस्त हो रहा था, इस बीच लाखों लोगों का व्यापार ठप हो गया, लाखों नौकरियां चली गई। पूरा देश जैसे थम सा गया था, लेकिन हम अपने जीवन की रक्षा के लिए इन तमाम प्रतिबंधों को स्वीकार करते हैं। लेकिन सरकार ने लोगों की मांग पर इस लॉकडाउन के नियमों को थोड़ा ढीला करना शुरू कर दिया है। इसका अर्थ यह नहीं कि देश से संकट टल गया है, अभी भी हमारा देश इस संक्रमण से पूरी तैयारी से लड़ रहा है। जब तक पूरी तरह इस बीमारी का सफाया नहीं हो जाता, तब तक कई क्षेत्रों में लॉकडाउन के नियमों का पालन करते रहेंगे। आचार्यश्री सुदर्शनजी ने कहा कि यह सच है कि लॉकडाउन की पीड़ा हम अभी भी नहीं भूले हैं, लेकिन सरकार ने अनलॉक-1 की घोषणा इसलिए की है कि हम पूरी सतर्कता के साथ अपना कार्य प्रारंभ कर सकें। अनलॉक-1 का यह कभी भी अर्थ नहीं मानना चाहिए कि हम स्वच्छंद हो गए, पहले के जैसे हम आचरण करना प्रारंभ करें, घर से निकलने की सुविधा अवश्य मिली है, लेकिन सड़कों पर कुछ उच्‍चश्रृंखल बनने की अनुमति नहीं है। जिस निष्ठा से हमलोगों ने पिछले दिनों लॉकडाउन में घरों में रहकर आहार-व्यवहार और आचरण, आपत्तिजनक भोजन से स्वयं को बचाया है, उसे अभी भी पालन करते रहने की आवश्यकता है। ईश्वर की कृपा से हम अब तक जिस परिस्थिति में रहकर स्वयं को बचाते रहे हैं, उसी तरह अभी भी संयमित जीवन के साथ रहने की आवश्यकता है। कई विचारक तो अब यह भी कहने लगे हैं कि जिस प्रकार लॉकडाउन में हम लोगों ने अपने जीवन को संयमित किया, उसी संयम को अब हम सबों को जीवन जीने का तरीका बना लेना पड़ेगा। कोई नहीं जानता कि इस कोरोना संकट के बाद और कोई संकट नहीं आएगा। इसीलिए हम अपने शरीर, अपने बच्चों एवं परिवार की रक्षा के लिए नए सिरे से संयमपूर्वक जीने का प्रयास करें। साथ ही योग, ध्यान के साथ वैसे सभी आपत्तिजनक आहार-विहार एवं अनैतिक आचरण से दूर रहकर आध्यात्मिक जीवन के नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
आचार्य सुदर्शनजी ने कहा कि प्राचीनकाल में हमारा भोजन शाकाहारी होता था, हमारा आचरण नैतिक होता था, जिससे समाज में शान्ति और सद्भाव बना रहता था। आज मांस-मदिरा जैसे पदार्थों का सेवन जैसे-जैसे बढ़ रहा है, वैसे'वैसे बीमारियां बढ़ रही हैं। इसीलिए कहा जाता है कि कोरोना काल के प्रतिबन्‍धों के साथ जीने के लिए तैयार रहें। जिस प्रकार हमारे समाज में अधर्म, अनीति, अनाचार, अत्याचार बढ़ रहा है, उससे स्पष्ट है कि अगर हमने अपना आचरण नहीं बदला, तो कोरोना जैसी और भी बीमारी आ सकती है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि कोरोना के संकट काल में लोग अधिक से अधिक आध्यात्मिक बनते जा रहे हैं। अनेक लोग जीवन रक्षा के लिए शाकाहारी बन गए हैं, शराब सिगरेट का त्याग कर दिया है और जिन घरों में कभी पूजा-पाठ नहीं होती थी, उन घरों में अब यज्ञ, हवन, पूजा एवं शंख-ध्वनि सुनाई पड़ रही है, क्योंकि लोगों ने अब अपने जीवन, अपने बच्चों एवं परिवार से प्यार करना शुरू कर दिया है। इसीलिए मेरा अनुरोध है कि अनलॉक-1 में लॉकडाउन के नियमों का आत्मरक्षा के लिए पालन करते हुए जीने का प्रयास करें।