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पटना (बिहार) : सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि पर धर्मेन्द्र कुमार  ने की विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित।

पटना (बिहार) : सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि पर धर्मेन्द्र कुमार ने की विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित।

पटना (बिहार) : सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि पर धर्मेन्द्र कुमार  ने की विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित।।


By: बिहार दर्पण न्यूज़...मुख्य संपादक रवि शंकर कुमार सिन्हा

पटना :  जन संधर्ष विराट पार्टी के    बिहार प्रभारी श्री धर्मेन्द्र कुमार उर्फ धरम सिंह  ने सुभाष चंद्र बोस के पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने कहा कि सुभाष चंद्र बोस एक महान क्रान्तिकारी और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' का नारा देने वाले नेताजी, एक ऐसा व्यक्तित्व थे। जिसने अपने कार्यों से अंग्रेजी सरकार के छक्के छुड़ा दिये थे। 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में जन्मे सुभाष ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक से और कलकत्ता विश्वविद्यालय से पूर्ण कर उन्होंने इंग्लैंड जा कर 1920 में वे 'इंडियन सिविल सर्विस' की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली, परंतु अपने देशभक्त आदर्शों की वजह से 1921 में अपना नाम प्रोबशनरज़ की सूची से वापिस ले लिया। 16 जुलाई 1921 को उनकी, गांधी जी से पहली मुलाक़ात हुई, परंतु यह मुलाक़ात निराशाजनक रही। फिर कलकत्ता जा कर वे देशबन्धु चितरंजन दास से मिले, उनसे बहुत प्रभावित हुए और जैन आंदोलन से जुड़ गए। उन्हें बंगाल प्रान्त कांग्रेस कमेटी प्रचार प्रधान बनाया गया। और 1923 में उन्हें बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव नियुक्त किया गया। पर सी.आर.दास के साथ वे स्वराज पार्टी से जुड़ गए और 1924 में कलकत्ता नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाए गए। उन्होंने नगर निगम के कर्मचारियों को पहली बार 'ख़ादी' की वर्दी दी। अंग्रेजों को उनकी प्रसिद्धि बर्दाश्त नहीं हुई तो उन्होंने 1924 में सुभाष को क्रांतिकारी योजना बनाने के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिया और जेल भेज दिया। परंतु उनका स्वास्थ बिगड़ने के चलते 1927 में उन्हें रिहा कर दिया गया। 1928 में साईमन कमीशन के बहिष्कार की अगुआई की, और नवम्बर 1928 में (इंडिपेंडेंस ऑफ इण्डिया लीग) का गठन किया। गिरफ़्तार हो कर जेल चले गए, और वहीं रहते कलकत्ता के महापौर चुने गए। 1932 में पुनः गिरफ़्तार हुए, पर स्वास्थ ख़राब होने के कारण, उन्हें इलाज के लिए यूरोप जाने की अंग्रेज़ी सरकार ने अनुमति दे दी। वहाँ उन्होंने ‘आस्ट्रिया-भारत संघ’ की स्थापना की, 1934 में पिता के देहांत की खबर पा कर कलकत्ता  आए, पर सरकार ने उन्हें नज़रबंद कर दिया और 1935 में वहीं से यूरोप वापिस भेज दिया। 1938 में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, परंतु गांधी जी के विद्रोह के चलते त्यागपत्र दिया और फिर कांग्रेस छोड़ दी। नेता जी हिटलर से मिले, 1943 में जर्मनी छोड़ी और जापान, फिर सिंगापुर पहुँचे और 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' की कमान अपने हाथ में ली, उसका प्रतीक चिन्ह एक' दहाड़ता बाघ' था। अपने देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाली इस महान हस्ती का 18 अगस्त 1945 को हवाई दुर्घटना के निधन हो गया।

वहीं आज उनकी पुण्यतिथि पर धर्मेंद्र कुमार  ने उन्हें भावपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित किया।