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राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की १५१ वीं जयन्ती हमें     उनके जीवनदर्शन को याद कर     कल्याणकारी तत्वों को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की १५१ वीं जयन्ती हमें उनके जीवनदर्शन को याद कर कल्याणकारी तत्वों को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है।

 



 गाँधीजी ने आश्रम में रहने वालों के लिए ग्यारह व्रतों का पालन अनिवार्य रखा था। ये ग्यारह व्रत है- 

अहिंसा, सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,असंग्रह (अपरिग्रह)शरीर श्रम,अस्वाद,सर्वत्र भय वर्जनं,सर्वधर्म समभाव, स्वदेशी, स्पर्श भावना

 

इनमें प्रथम पाँच योग के यम हैं।

ये अष्टांगयोग में सर्वप्रथम पालनीय पाँच यम है।


शेष छ: व्रत के पालन में योग के दूसरे अंग नियम के -शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान का पालन अनिवार्य है।

शौच अर्थात स्वच्छता से अभय को, संतोष से अस्वाद और स्वदेशी भावना को, तप से शारीरिक श्रमशक्ति को, स्वाध्याय से सर्वधर्म समभाव को बल मिलता है।

महात्मा गांधी स्वभावतः योगी थे और योग की उपयोगिता जनसामान्य और राष्ट्र के लिए सिद्ध करते हुए अपने चार मौलिक सिद्धांत -

सत्य, अहिंसा, सादगी एवं मितव्ययिता और श्रम के महत्व रूप में दिया।

अपरिग्रह को न्यासी के सिद्धांत रूप में प्रस्तुत किया।

आधुनिक भारत में योग परम्परा के संरक्षण,पोषण तथा संवर्द्धन में महात्मा गाँधी का अवदान अप्रत्याशित उपलब्धियों का साक्षी है। 

महात्मा गांधी पर कुछ बोलने के लिए एकादश व्रती होना कितना अनिवार्य है,   

 वह भी सोच सकते हैं जो गांधी जी के जीवनदर्शन की आलोचना करते हैं।

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