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बिहार में नगर निवेशन संगठन (टाउन प्लैनिंग ऑर्गेनाइजेशन) को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता ।

बिहार में नगर निवेशन संगठन (टाउन प्लैनिंग ऑर्गेनाइजेशन) को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता ।

 बिहार में नगर निवेशन संगठन (टाउन प्लैनिंग ऑर्गेनाइजेशन) को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता ।


पटना

यूं तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही बिहार में नगर निवेशन की शुरुआत तो हो गई थी। साठ के दशक में यह पूर्णरूपेण अपने स्वरूप में आ गया था। आश्चर्य होगा कि तत्समय स्थानीय स्वायत्त शासन विभाग (Local Self Government Department) के अधीन होते हुए भी नगर निवेशन संगठन (Town Planning Organization) के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की संख्या लगभग दोगुनी थी।

तत्कालीन प्रशासन विशेष रूप से तत्कालीन माननीय मुख्यमंत्री इस संबंध में इतने संवेदनशील थे कि वे दिल्ली के मास्टर प्लान तैयार करने वाले श्री रघुवीर लाल बावा को बुलाकर यहां उन्हें स्थाई मुख्य नगर निवेशक (Chief Town Planner) के रूप में पदस्थापित किया। उनके पूर्व यह कार्य लोक निर्माण विभाग के श्री अलतेकर साहब देख रहे थे। उनके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों के दो वरीय टाउन प्लानर श्री आरवी शर्मा (राजस्थान) तथा एलजी चौधरी (गुजरात) को क्रमशः नगर निवेशक तथ राज्य नगर निवेशक के रूप में कार्यरत थे। मुख्य नगर निवेशक श्री आर एल बावा के अनुभव की कोई सानी नहीं थी। दिल्ली के मास्टर प्लान तैयार करने के कारण उनका अनुभव विस्तृत था। एक तरफ तो वे सीधे राज्य के स्थानीय प्रशासन विभाग के सचिव, विकास आयुक्त एवं मुख्य सचिव के संपर्क में रहते थे तथा दूसरी तरफ वे नगर निवेशन संगठन के छोटे से छोटे कर्मचारी यथा प्रारूपक  एवं नील मुद्रक के संपर्क में रहते थे। वे प्रतिदिन प्रत्येक प्ररूपक एवं नील मुद्रक के प्लेन टेबल पर एक दो बार निश्चित रूप से पहुंच जाते थे तथा उनके कार्य के प्रगति का जायजा लेते थे। वे उन्हें आगे के सुधार हेतु निदेशन दिया करते थे।मुख्य नगर निवेशक श्री रघुवीर लाल बावा का सीधा संपर्क भारत सरकार के नगर एवं क्षेत्रीय निवेशन संगठन, स्कूल आफ प्लैनिंग एंड आर्किटेक्चर नई दिल्ली तथा जेजे स्कूल ऑफ प्लानिंग, मुंबई से अनवरत रहता था। उसी आधार पर उन्होंने संयुक्त बिहार में नगर निवेशन संगठन का नाम "नगर एवं क्षेत्रीय निवेशन संगठन" करा दिया। संयुक्त बिहार में उन्होंने इस संगठन को इतना विस्तारित किया कि इसकी शाखा पटना के अतिरिक्त रांची, धनबाद, भागलपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, गया, बोकारो एवं अन्य शहरों में कर दिया। इस संगठन के अनुमति के बिना शहर में कोई नगर विकास विभाग का कार्य नहीं हो सकता था। संयुक्त बिहार में जितने भी क्षेत्रीय विकास प्राधिकार थे, वे बिना इस संगठन की राय के कोई कार्य नहीं कर सकते थे।  मुख्य नगर निवेशक श्री बावा ने मात्र बड़े शहरों में नगर निवेशन संगठन की शाखाएं ही नहीं स्थापित की, बल्कि उन बड़े शहरों में जिला पदाधिकारियों से संपर्क कर समाहरणालय बिल्डिंग में ही अपने संगठन के लिए भरपूर जगह की भी व्यवस्था की। अपने संगठन को प्रभावी बनाने के लिए अन्य शहरों में जिला पदाधिकारियों से संपर्क कर "बिहार भू उपयोग निबंधन अधिनियम,1948 पर भी अपना नियंत्रण बरकरार रखा। यद्यपि यह अधिनियम जिला पदाधिकारियों के प्रशासनिक नियंत्रण में था। अब तो यह अधिनियम प्रचलन में भी नहीं है। बिहार नगर पालिका अधिनियम 2007 की धारा 488 द्वारा इसे अन्य अधिनियमों के साथ निरसीत कर दिया गया।सबसे प्रमुख बात यह है कि मुख्य नगर निवेशक श्री बावा ने संयुक्त बिहार में विभिन्न शहरों में अपना कार्यालय मात्र ही नहीं स्थापित किया, बल्कि उन कार्यालयों में सहायक नगर निवेशक तथा उन्हें मदद के लिए पूरे कार्यालय का रूपरेखा खड़ा कर उसे मूर्त रूप दिया जिसमें आर्किटेकचर, प्रथम श्रेणी प्रारूपक, सोसिओ इकनोमिक इन्वेस्टिगेटर, ब्लूप्रिंटर (निल मुद्रक),अकाउंटेंट, कैशियर,ट्रेजरी सरकार से लेकर आदेशपाल एवं कार्यालय चपरासी तक की व्यवस्था की।  वे महीने में एक या दो बार निश्चित रूप से जाकर उन क्षेत्रीय कार्यालयों के कार्यों का स्वयं पर्यवेक्षण किया करते थे।उन्होंने पटना, बोधगया, रांची, धनबाद, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया बेगूसराय और बोकारो आदि शहरों का मास्टर प्लान भी तैयार करवाया था। यह दूसरी बात है कि तत्समय मंत्रिमंडल सचिवालय की दुरूह प्रक्रिया के पेंच में फंस कर पटना के अतिरिक्त किसी अन्य शहर का मास्टर प्लान मंत्री परिषद से पारित नहीं हो सका।आज शहरों के नियोजित बसावट एवं उनके विस्तार के क्रम में इसकी कितनी आवश्यकता महसूस की जा रही है, इसे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। वर्तमान में नगर विकास एवं आवास विभाग बरसाती मेंढक के समान आए प्राइवेट टाउन प्लैनिंग एजेंसी से शहरों का मास्टर प्लान तैयार कराने का आए दिन डपोरशंखी घोषणाएं कर रही है। ये प्राइवेट एजेंसियों शहरियों से संपर्क कर सोसिओ इकोनॉमिक इन्वेस्टीगेशन करवाएगा कि नहीं, बिल्कुल संदेहास्पद है। बिना "सोसिओ इकोनॉमिक इन्वेस्टीगेशन" करवाए, टेबल पर बैठकर मास्टर प्लान तैयार कर विभाग को सौंप कर अपना कॉन्ट्रैक्ट मनी हासिल कर चलती बनेगी। सबसे तकलीफदेह बात तो यह है कि आज नगर विकास एवं आवास विभाग में कोई भी मुख्य नगर निवेशक, नगर निवेशक, सहायक नगर निवेशक, आर्किटेक्चर, सोसिओ इकोनॉमिक इन्वेस्टीगेटर, किसी भी श्रेणी का प्रारूपक, ब्लूप्रिंटर आदि बिलकुल नहीं है जो इन प्राइवेट एजेंसियों द्वारा तैयार मास्टर प्लान का सांगोपांग जांच कर सके। तभी तो उसे सरकारी स्वीकृति के बाद मंत्री परिषद की स्वीकृति हेतु भेजा जा सकेगा। आज तो विभाग की स्थिति ऐसी हो गई है कि एक अधीक्षण अभियंता (सिविल) के स्तर के इंजीनियर को मुख्य नगर निवेशक घोषित कर विभाग रखे हुए हैं।  उनसे नगर निवेशन की कौन सी उम्मीद की जा सकती है, यह बिलकुल संदेहास्पद है।वर्तमान सरकार खासकर विभागीय मंत्री के लिए यह लाजमी है कि इस समस्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करें तथा बिहार में पहले के समान एक सुदृढ़ नगर एवं क्षेत्रीय निवेशन संगठन की स्थापना का आदेश देने की कृपा करें। कारण अनियोजित ग्रोथ एक न एक दिन बिहार को ले डूबेगा। फिर इसे संभालना मुश्किल होगा। इसकी चिंता अभी हाल में बाहर से आए विभिन्न राज्यों के नगर निवेशकों ने भी की है। वर्तमान उपमुख्यमंत्री मंत्री सह मंत्री नगर विकास एवं आवास विभाग से यह आग्रह है कि इस मुद्दे को विभागीय पदाधिकारियों के भरोसे न छोड़कर स्वयं देखें। तभी शहरों का कल्याण हो सकता है क्योंकि नगर विकास एवं आवास विभाग वर्तमान पदाधिकारियों का ध्यान सिर्फ नगर निकायों का अधिकार छीन कर अपने हाथों में लेने की है। जो संविधान के 74वे संशोधन के बिल्कुल विपरीत है। आशा ही नही विश्वास है कि उपमुख्यमंत्री इसपर त्वरित ध्यान देंगे।



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