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ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा में साहित्यकार राजेन्द्र यादव की जयंती मनायी गयी.।।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा में साहित्यकार राजेन्द्र यादव की जयंती मनायी गयी.।।

 ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा में साहित्यकार राजेन्द्र यादव की जयंती मनायी गयी.।।



ज़ाहिद अनवर (राजु) / दरभंगा


*दरभंगा*--आज विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में साहित्यकार राजेन्द्र यादव की जयंती मनायी गयी। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो० राजेन्द्र साह ने कहा कि उनका सम्पूर्ण लेखन जनचेतना का लेखन है। उन्होंने कहा कि वे 'असहमति' के लेखक थे। प्रेमचंद ने जिस प्रकार प्रगतिशीलता की राह दिखायी ठीक उसी प्रकार राजेन्द्र यादव ने भी अस्सी-नब्बे के दशक में पिछड़े-अति पिछड़े समाज को नई राह दिखाई। 'हंस' के सम्पादक रहते हुए उन्होंने वैसे मुद्दों पर बेबाक ढंग से लिखा जिसे साहित्य में दर्ज करने से तमाम साहित्यकार डरते रहे। बेगूसराय में राजेंद्र यादव से हुई मुलाकात का भी उन्होंने जिक्र किया। 'सारा आकाश' उपन्यास पाठकों को जिस प्रकार आखिर तक बांधे रहता है वह औपन्यासिक कला का बेहतरीन नमूना है। 'टूटना' कहानी से आज के आधुनिक दाम्पत्य जीवन को जोड़ते हुए उन्होंने बताया कि आज परिवार छोटी से छोटी बात पर बिखर जाता है। उन्होंने अपनी वाणी को विराम देते हुए कहा कि जीवन की सच्चाई ही उनके साहित्य का कथ्य है। इस अवसर पर डॉ० सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने कहा कि सुविख्यात साहित्यकार और सम्पादक राजेन्द्र यादव को आज याद करना बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आज जब अस्मितामूलक विमर्श पर बहस छिड़ी है तब राजेन्द्र यादव से होकर ही कोई रास्ता निकलेगा क्योंकि हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री विमर्श जैसे अति गम्भीर विषयों को सबसे पहले 'हंस' के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने ही उठाया था। उन्होंने कहा कि वे बहुत छोटी सी उम्र से ही साहित्य सृजन में सक्रिय हो गए थे। उनके उपन्यास 'सारा आकाश' के विषय में बोलते हुए उन्होंने बताया कि  'सारा आकाश' लिखने की प्रेरणा उन्हें राष्ट्रकवि दिनकर से मिली थी। डॉ० आनन्द प्रकाश गुप्ता ने इस अवसर पर कहा कि राजेन्द्र यादव कालजयी साहित्यकार थे, 'हंस' को पुनर्जीवित कर उन्होंने साहित्यिक समाज को एक नयी दिशा दी। 'नयी कहानी' आंदोलन में जो तिकड़ी सबसे सक्रिय रही उसमें राजेन्द्र यादव ने सबसे अहम भूमिका निभाई। डॉ० अखिलेश कुमार ने कहा कि राजेन्द्र यादव 'नयी कहानी' के सबसे महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। प्रेमचंद जिस कार्य को अधूरा छोड़ गए थे उसे राजेन्द्र यादव जी आजीवन पूरा करते रहे। श्री अखिलेश कुमार राठौर ने कहा कि राजेन्द्र यादव की कहानियों, उपन्यासों, विचारों में जिंदगी की जो सच्चाई छिपी है उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। उनकी महत्त्वपूर्ण कहानियों की समीक्षा करते हुए उन्होंने बताया कि वे हर परिस्थिति में नया मार्ग ढूंढ लेते थे। शोधप्रज्ञ कृष्णा अनुराग ने कहा कि राजेन्द्र यादव के व्यक्तित्व में दृढ़ता थी। आज जब हिंदी साहित्य में एक प्रकार की रिक्तता आ गयी है और रीढ़ विहीनता दिख रही है तब राजेन्द्र यादव की ओर पुनः-पुनः देखने की जरूरत है। इस अवसर पर शोधप्रज्ञ अभिशेक कुमार सिन्हा, धर्मेन्द्र दास, पुष्पा कुमारी समेत बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे।

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